मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने और देश और प्रदेश में कोरोना महामारी के रहते हुए जिन समस्याओं का सामना शिवराज सिंह चौहान को वर्तमान में करना पड़ा है, ऐसी स्थिति मे मंत्रिमंडल का विस्तार और प्रदेश में उपचुनाव इतने आसान नहीं है जितना कि भाजपा समझ रही है ?सिंधिया समर्थक मंत्री एवं विधायकों ने जहां अपने कांग्रेस से सीट छोड़कर भाजपा में प्रवेश किया है इसके रहते हुए चंबल संभाग में जहां सिंधिया समर्थको ने पिछला चुनाव कांग्रेस से लड़ा था वहीं दूसरी ओर अगर वर्तमान में भाजपा से चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा के ही वरिष्ठ कार्यकर्ता जो पिछले लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं और विधानसभा का चुनाव लड़ने चाह रहे थे ,वे दावेदार नाराज हैं तो दूसरी ओर आमजनता का तात्कालिक परिस्थितियों के हिसाब से चुनाव में परिणाम रहेगा कोरोना महामारी के रहते हुए और प्रदेश एवं देश में आम जनता की समस्याओं के रहते हुए मध्यप्रदेश में उपचुनाव में वैसे भी मतदान प्रतिशत बहुत कम रहेगा मतदाता का रुझान उपचुनाव की ओर नहीं है बल्कि उसकी स्वयं की रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर वह वर्तमान में जूझ रहा है । आज उसे चुनाव या मंत्रिमंडल से कोई लेना देना नहीं है ,बल्कि कोरोना के रहते हुए जो उनकी वर्तमान में अर्थव्यवस्था चरमरा गई है और दूसरी और भविष्य को लेकर ज्यादा चिंतित हैं । ऐसी स्थिति में मध्यप्रदेश में उपचुनाव प्रत्याशी चयन ,प्रत्याशियों के व्यवहार और पार्टियों के आने वाली रणनीति पर काफी निर्भर करेगी। मध्यप़देश मे कमलनाथ सरकार का गिरना जितना आसान था शिवराज सरकार का स्थिर रहना उतना कठिन है ,यह कहना लाजमी नहीं होगा कि शिवराज सिंह चौहान को "मंजिल पर पहुंचना आसान है, मगर मंजिल पर ठहरना मुश्किल "।यह तो आने वाला समय ही तय करेगा कि मध्य प्रदेश के भबिष्य के गतृ में क्या छुपा हुआ है ? मगर फिर भी यह बात तो निश्चित है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मध्य प्रदेश में भाजपा एवं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उपचुनाव एवं मंत्रिमंडल विस्तार चने चबाने जैसा है ।
मंत्रिमंडल का विस्तार और उपचुनाव, मध्यप्रदेश में आसान नहीं है?